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लघु कथा – भूख का कोई धर्म नहीं होता

मैं पार्क में बैठे-बैठे बहुत बोर हो चुका था
तो मैंने सोचा जब तक शिवम आता है, तब तक मैं
बाहर सड़क पर टहल लेता हूं । मैं पार्क से बाहर निकला
और कुछ गुनगुनाते हुए पास की चाय की दुकान के पास टहलने लगा । कुछ देर बाद मैंने एक चाय का ऑर्डर देते हुए
जेब से अपना फोन निकाला और शिवम को कॉल किया
शिवम ने मेरा कॉल रिसीव किया और
मेरे बोलने से पहले ही जवाब दिया भाई बस अभी आ रहा हूं !
चाय तैयार थी, मैंने चाय हाथ में ली और वहीं टहलते-टहलते
पीने लगा । उसी दुकान पर सफी चाचा चाय की चुस्कियाँ लेते हुए
अखबार पढ़ रहे थे । मैं भी उनके पास में जाकर बैठ गया
और अखबार का एक हिस्सा गौर से देखने लगा ।
तभी पास की गली से आवाज आई “मूर्तियाँ ले लो मूर्तियाँ…..
भगवान की मूर्तियाँ…… राम की मूर्ति, कृष्ण की मूर्ति,
गणेश की मूर्ति…. मूर्तियाँ ले लो.. मूर्तियाँ… ।
अखबार से नजर हटाकर मैं उस आवाज को
बहुत गौर से सुनने लगा धीरे-धीरे वह आवाज
चाय की दुकान के नजदीक आते हुए सुनाई दे रही थी,
फटे हाल सिर पर जालीदार टोपी पहने एक बूढा आदमी
मूर्तियों का टोकरा लेकर जैसे ही गली के नुक्कड़ पर आया
वह आवाज और तेज मेरे कानों तक पहुंचने लगी
और मैं एक बार उस बुजुर्ग आदमी को देख रहा था
और दूसरी बार उसकी आवाज पर ध्यान केंद्रित कर रहा था ।
अचानक वह बूढा आदमी चाय की दुकान पर आ गया
और फिर से वही आवाज बिल्कुल मेरे नजदीक गूंजने लगी ।
मूर्तियाँ ले लो मूर्तियाँ…. भगवान की मूर्तियाँ…
और वह बुजुर्ग मेरे पास आकर बोला बेटा दिवाली है,
कुछ मूर्ति ले लो मेरी बोहनी भी हो जाएगी और
मेरे सिर का कुछ बोझ भी हल्का हो जाएगा,
बेटा अल्लाह ताला आपका भला करेगा एक मूर्ति ले लो ।
मैं उस बुजुर्ग की आँखों की पलकों को एकटक देखने लगा
जो मुझसे उम्मीद लगा रही थी ।
मैंने बाबा से पूछा- एक मूर्ति का कितना दाम है बाबा ?
बुजुर्ग आदमी ने झट से उत्तर दिया-
बेटा मैं एक मूर्ति 50 रुपए में बेचता हूँ पर अभी बोहनी करनी है
तुम्हें 40 रुपये में ही दे दूंगा ।
मैंने जेब से पर्स निकाला और उस बाबा को
50 रूपये का नोट देते हुए कहा –
बाबा जब मूर्ति का दाम 50 रुपये है तो
आप पूरे 50 रूपये ही रखिए,
इतना कहते ही बाबा ने वह नोट थामा और मुझे..
अल्लाह आपको ढेर सारी खुशियों से नवाजे…
कहते हुए आगे चलने लगा ।
सफी चाचा अखबार को छोड़ कर बड़े ही तीखे अंदाज में बैठे हुए थे
उन्होंने उस बाबा को जाते हुए रोका और पूछा- मुसलमान हो ?
बाबा ने रुक कर उत्तर दिया- हाँ, अल्लाह का बंदा हूँ बाबू ।
फिर क्या था सफी चाचा ने बाबा को
खरी-खोटी सुनाना शुरू कर दिया और कहा-
मुसलमान होकर राम और कृष्ण की मूर्तियां बेचते फिर रहे हो
खुदा आपको कभी माफ नहीं करेगा ।
बुजुर्ग ने उत्तर दिया : मेरा जवान बेटा अभी एक्सीडेंट में मारा गया
और इन मूर्तियों से ही मैं सारे परिवार का पेट पालता हूँ ।
नम आँखों से बहुत विनम्र आवाज में बुजुर्ग आदमी ने
अपनी बात खत्म करते हुए कहा- “भूख का कोई धर्म नहीं होता मियां ।”

सफी चाचा अब भी मूर्तियों के टोकरे को देख रहे थे और मैं एक ऐसे इंसान को, जो धर्म और भूख में वास्तविक विरोधाभास प्रकट करके अपनी दो जून की रोटियाँ कमाने के लिए आगे बढ़ रहा था ।

-पवन सिंह राठौड़
जयपुर ,राजस्थान

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