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नमिता पटेल छत्तीसगढ़

ये कैसा मिथ्या मास हैं.


आँसुओं का सागर हैं..
वेदना का आकाश हैं..
अवनि पर बरसे अग्नि..
बुझती हृदय की आस हैं..
करुणा का गीत सुनाती..
मेरी हर एक श्वास है..
ना दिन हैं ना रात है..
ये कैसा मिथ्या मास हैं..
कल्याण का कलरव हैं..
पर ये मिथ्या आभास हैं..
क्यो भूले अपना परिचय..?

शक्ति का हम सबमें वास है..

समय तो न्याय का सदा ही शुभ है..
भला फिर हमारा क्यो अवकाश हैं..?
जीवन की अनुभूति तो आत्मीयता से हैं..
जीवन्तता का प्रतीक आत्म विश्वास हैं…

श्वेत कभी श्याम को बुलाये
ये मेरी आस्था सुमन की सुवास हैं..

सत्यम शिवम सुंदरम

नमिता पटेल

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