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मनीषा "आज़ाद अल्फ़ाज़" हरियाणा

किसने कहा है अँधेरा बुरा है!

किसने कहा है अँधेरा बुरा है!…

दूर तक पसरी
शांति की उस चादर में सोती
अनेकों सिसकियों को
तुमने भी सुना होगा !…
कालिक की भरी
रात की उस डिबिया से
एक सिंदूरी रंग
तुमने भी चुना होगा !…

तुमने भी देखा होगा न !
नभ की दुग्धमेखलाओं को
पायल पहन,
क्षितिज पर नृतन करते हुए…
गांधारी बन, उजालों के मौन में
मन के फ़कीर झींगुरों को
कीर्तन करते हुए !…

आभास हुआ तो होगा !…
कि करोड़ों दम्भित देह पर विजयी
स्नेहसिक्त, संघर्ष की एक लौ रही है…
हाँ, वही चाँदनी है यह
जो वसुधा के रोम रोम
निश्छल प्रेम बो रही है…

इन्ही अंधेरों में ….
तुमने भी जिया होगा न !…
शीतल पवन के गीतों में उनका स्पर्श…
इन्ही की छाती पर पुते होंगे
तुम्हारी आत्मिक स्मृतियों के सतरंग
यही रहा होगा संवेदनाओं का अर्श….

काले इस स्पर्श बिना उजाला अधूरा है….
हमने नही कहा कि अँधेरा इतना बुरा है…..

……मनीषा ‘ आज़ाद अल्फ़ाज़’

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